मल्टीकैप फंड को लेकर सेबी का नया नियम: इससे रिटर्न पर पड़ने वाले असर को जानें

सेबी ने एक नया नियम बनाया है। इस नियम की वजह से मल्टीकैप फंड को निवेशक की रकम का एक बड़ा हिस्सा स्मॉलकैप यानी छोटी और मिडकैप यानी मझोले स्तर की कंपनियों में लगाना होगा। (PC ANI)

ankit kumar

September 21, 2020

Business

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zeenews

नई दिल्ली, धीरेंद्र कुमार। पूंजी बाजार नियामक सेबी ने मल्टीकैप फंड्स से कहा है कि उन्हें लार्ज, मिड और स्मॉलकैप, हर सेग्मेंट में अपने निवेश का कम-से-कम 25 फीसद हिस्सा रखना होगा। इससे स्मॉलकैप सेग्मेंट को निश्चित रूप से फायदा होगा, क्योंकि उनमें निवेश बढ़ेगा। लेकिन इससे निवेशकों की उस उम्मीद की रक्षा में बड़ी मुश्किल आएगी कि निवेश पर उन्हें भरपूर रिटर्न मिले। 

सेबी ने एक नया नियम बनाया है। इस नियम की वजह से मल्टीकैप फंड को निवेशक की रकम का एक बड़ा हिस्सा स्मॉलकैप यानी छोटी और मिडकैप यानी मझोले स्तर की कंपनियों में लगाना होगा। कंपनियों को अगले वर्ष 31 जनवरी तक मल्टीकैप फंड को अपनी कम-से-कम 25 फीसद संपत्ति लार्ज, मिड और स्मॉलकैप स्टॉक्स में रखने की प्रक्रिया पूरी कर लेनी होगी। सेबी का मानना है कि इस तरह से ये फंड सही मायने में मल्टीकैप फंड होंगे। नियामक के मुताबिक एक मल्टीकैप फंड में सभी आकार की कंपनियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। 

हालांकि अगर लार्ज, मिड और स्मॉलकैप फंड की परिभाषा पर गौर करें तो पाएंगे कि 25 फीसद की यह सीमा मल्टीकैप फंड में मिड और स्मॉलकैप का जरूरत से ज्यादा प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगी। अगर आप इक्विटी मार्केट में सेबी की ही परिभाषा लागू करते हैं तो 74.1 फीसद मार्केट वैल्यू लार्जकैप में, 15.6 फीसद मिडकैप में और बाकी 11.3 फीसद स्मॉलकैप में है। अगर सही मायनों में मल्टीकैप फंड हो और यह इक्विटी मार्केट का ठीक से प्रतिनिधित्व भी कर रहा हो तो कोई भी लिमिट इसी वैल्यू के आसपास होनी चाहिए।

बहुत से लोकप्रिय मल्टीकैप फंड ऐसे हैं जिनका स्मॉलकैप में निवेश बहुत कम है। मल्टीकैप फंड को सही मायनों में ऐसा ही होना चाहिए। एक निवेशक के तौर पर मैं अपने फंड मैनेजर से उम्मीद करूंगा वह मेरी रकम ऐसे सेग्मेंट में कम लगाए जिसके खराब प्रदर्शन की आशंका हो। मैं यही चाहूंगा कि जो सेग्मेंट बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद देता हो, मेरा फंड मैनेजर मेरी ज्यादा रकम उसी सेग्मेंट में लगाए। स्मॉलकैप में बहुत कम रकम निवेश करने वाले फंडों ने हाल में यह काम बहुत अच्छी तरह से किया है और इसके लिए उनकी सराहना भी की जानी चाहिए। 

सबसे अहम बात यह है कि सेबी के नए नियम ने मल्टीकैप फंड निवशकों के लिए जोखिम बढ़ा दिया है। मिडकैप और स्मॉलकैप फंड में तेज उतार-च़़ढाव का जोखिम अधिक होता है। अब सेबी चाहता है कि मल्टीकैप फंड्स ऐसे जोखिम वाले स्टॉक ज्यादा रखें। मेरे लिए इसका तर्क समझना मुश्किल है। हाल के समय में निवेशकों को छोटी अवधि में तेज उतार-च़़ढाव और अनिश्चितता का सामना करना पड़ा है। ऐसे में लोकप्रिय और बेहद उपयोगी फंड को ज्यादा जोखिम वाले स्टॉक खरीदने के लिए मजबूर करना ठीक नहीं है।

(लेखक वैल्यू रिसर्च के सीईओ हैं। प्रकाशित विचार लेखक के निजी हैं।)

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