अमेरिका के चार बार हाथ मारने की चर्चा

हाल के कई वर्षों में अमेरिका ने अंतर्रष्ट्रीय समुदाय में चार बार हाथ मारने की कार्रवाई की, जिसने सफलता से सभी लोगों का ध्यान खींचा। चार बार हाथ मारने का क्या मतलब है?अभी हम बताएंगे। पहला, अमेरिका ने माथे पर हाथ मारकर फैसला किया। अमेरिकी आधिपत्य के पतन के साथ अमेरिका एक सुपर देश कभी […]

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June 11, 2021

International

Politics

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हाल के कई वर्षों में अमेरिका ने अंतर्रष्ट्रीय समुदाय में चार बार हाथ मारने की कार्रवाई की, जिसने सफलता से सभी लोगों का ध्यान खींचा। चार बार हाथ मारने का क्या मतलब है?अभी हम बताएंगे।

पहला, अमेरिका ने माथे पर हाथ मारकर फैसला किया। अमेरिकी आधिपत्य के पतन के साथ अमेरिका एक सुपर देश कभी नहीं रहा। दूसरों से पैसे या लाभ छीनना अमेरिका की एक आदत बन गयी, न सिर्फ़ अपने दुश्मन देशों से बल्कि अपने मित्र देशों से भी। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस पक्ष में खूब माहिर हैं। अपने कार्यकाल में वे बारी-बारी से माथे पर हाथ मारकर विभिन्न देशों के टैरिफ़ को बढ़ाते थे, सहयोगी देशों को सैन्य खर्च बांटते थे, और तरह-तरह के अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका की सदस्यता हटाते थे।

दूसरा, अमेरिका को छाती पर हाथ मारकर क़सम खाना पसंद है। अमेरिकी वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पद ग्रहण से पहले छाती पर हाथ मारकर क़सम खायी कि उनकी नीति व कदम ट्रंप से बिल्कुल अलग हैं। उन्होंने अमेरिका के अंतर्रष्ट्रीय समुदाय में वापस लौटने के नारे में यह घोषणा की कि“अमेरिका फर्स्ट”का युग हमेशा के लिये चला गया। लेकिन वास्तविकता से यह जाहिर हुआ है कि बाइडेन ने केवल दूसरे ढंग से ट्रंप की नीति व कदम उठाये हैं।

तीसरा, अमेरिका ने जांघ पर हाथ मारकर पछताया। केवल दो वर्षों से भी कम समय में अमेरिकी सरकार का नया कर्ज खरबों डॉलर बढ़ गया है। साथ ही, अमेरिकी समाज में गंभीर मुद्रास्फीति के कारण अमेरिका के प्रति अदरूनी व बाहरी दोनों संकट पैदा हुए हैं। वर्तमान का अमेरिका सचमुच कमजोर हो गया है। अमेरिकी आधिपत्य पर कायम रहने के लिये बाइडेन को विवश होकर अपने सहयोगी देशों से आर्थिक लूट करनी पड़ी। पहले अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और मित्र देशों को दिये गये वचनों के प्रति अमेरिका ने जांघ पर हाथ मारकर पछताया।

चौथा, अंत में अमेरिका कूल्हे पर हाथ मारकर चला गया। हाल ही में अमेरिकी सरकार ने अचानक यह घोषणा की कि अमेरिका छै देशों से लगभग 2.1 अरब डॉलर वाले मालों के प्रति 25 प्रतिशत का प्रतिशोधी टैरिफ़ लेगा। गौरतलब है कि उन छै देशों में ब्रिटेन, इटली, ऑस्ट्रेलिया, भारत, तुर्की और स्पेन शामिल हैं, जो सभी अमेरिका के सब से“घनिष्ठ”सहयोगी देश हैं। यह कहा जा सकता है कि अमेरिका की यह कार्रवाई सचमुच निर्दयी व कृतघ्न है। सहयोगी देश अमेरिका के हितों के सामने कुछ भी नहीं है। युग बदल रहा है। यह दुनिया पहले की दुनिया कभी नहीं होगी, और अमेरिका भी पहले का अमेरिका कभी नहीं होगा। हम एक साथ देखें कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अमेरिका और क्या स्वांग रचता है?!
 (चंद्रिमा – चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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